पृथ्वी प्रक्रिया प्रतिरूपण

पृथ्वी प्रक्रिया प्रतिरूपण

पृथ्वी प्रणाली विवर्तनिक फलकों की गतिकी, क्रोड-प्रावार क्रमिक विकास, भूदृश्य क्रमिक विकास की सतही प्रक्रियाएँ, जलीय चक्र, जलवायु परिवर्तन जैसे सभी स्थानगत एवं कालगत पैमानों पर एक गतिशील प्रणाली है। इन जटिल और परस्पर संबद्ध क्रियाविधियों का प्रतिरूपण ही भूवैज्ञानिक के लिए अंतिम चुनौती है, ये ही हमारे निवासी ग्रह के भविष्य की भविष्यवाणी करने का सामर्थ्य रखेंगे। किसी भी भौतिक प्रक्रिया के गणितीय सूत्रीकरण में विभिन्न जटिल समीकरण शामिल होते हैं, जिनका हल वांछित समाधानों को प्राप्त करने के लिए विभिन्न विश्लेषणात्मक और या संख्यात्मक तकनीकों का उपयोग करते हुए किया जा सकता है, जिसे भौतिक परिघटनाओं के शब्दों में विश्लेषण किया जा सकता है। इन समीकरणों में विभिन्न प्रकार के संकारक शामिल होते हैं जैसे अवकल, समाकल, अपसरण आदि। इन अवकल समीकरणों का समाधान पाने के लिए निर्धारणात्मक एवं प्रसंभाव्य विधियों का उपयोग करके इनका हल किया जा सकता है। निर्धारणात्मक अवकल समीकरण तब उत्पन्न होते हैं जब पैरामीटर निश्चितता के साथ मालूम हैं, जबकि प्रसंभाव्य अवकल समीकरण वे हैं, जिसमें उनके पैरामीटरों में यादृच्छिकता शामिल होती है।

सीएसआईआर - एनजीआरआई में भूकंपीय, तापीय, भूजल और सुनामीजनित प्रक्रियाओं के लिए पृथ्वी प्रणाली का प्रतिरूपण गणितीय और प्रसंभाव्य औज़ारों का उपयोग करके और उपलब्ध भूवैज्ञानिक जानकारी के साथ परिणामों को एकीकरण करके किया जाता है। यह सुस्पष्ट है कि भूभौतिकीय गुणधर्म, अरैखिक व्यवहार का प्रदर्शन करते हैं, अतः भूभौतिकीय एवं भूवैज्ञानिक समस्याओं के लिए मौजूदा सूत्रीकरण को अरैखिक / प्रसंभाव्य भूभौतिकीय प्रतिरूपों को समाविष्ट करते हुए पृथ्वी प्रणाली प्रक्रियाओं और उसके व्यवहारों को परिमाणित करने के लिए पुनः सूत्रीकरण किया जा रहा है।

सुनामी अध्ययन

अंडमान-सुमात्रा अधोपट्टन क्षेत्र ने पूर्व में कई बृहत् और बड़े भूकंप उत्पन्न किए थे, जिनमें से कुछ ने विनाशकारी सुनामियों को उत्पन्न किया है। सुनामी पूर्वानुमान प्रतिरूप सुनामी घटना के तुरन्त बाद लहर आगमन समय, लहर ऊंचाई और आप्लावन क्षेत्र का अनुमान उपलब्ध कराने के लिए है। विभिन्न निर्माणों पर सुनामी के कारण उत्पन्न बल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं; लहर ऊंचाइयों का उपयोग करके भारत और श्रीलंका के बीच बनाई गई किसी प्रस्तावित दीवार पर असर करने वाले सुनामी के कारण उत्पन्न बलों की गणना की गई है तथा समय के साथ बलों में बदलाव का अनुमान भी लगाया गया है। परिणाम बताते हैं कि महासागर अथवा समुद्र में दीवार ढाँचे पर असर करने वाले द्रवस्थैतिक बल निर्माण के लिए कोई बड़ी चुनौती खड़ी नहीं करेंगे, इससे इंगित होता है कि ऐसे अवरोधों का निर्माण सुनामी लहर ऊर्जा को नष्ट करेगा जिसके फलस्वरूप आसन्न तटीय क्षेत्रों का कम नुकसान होगा।

युग्मित सतह वायु तापमान (एस ए टी) एवं थल सतह तापमान के लिए कॉमसॉल बहुभौतिकी के साथ-साथ कालाश्रित पुनर्भरण का उपयोग करके छिछला अधस्तल तापमान के लिए संख्यात्मक समाधानः

पुनर्भरण में चरण परिवर्तनों के विभिन्न मूल्यों के लिए सतही एवं अधस्तल तापीय प्रोफाइल, उच्चतर पुनर्भरण दर की अवधि, और ऊष्मा अंतरण गुणांक का अध्ययन किया गया है। पुनर्भरण में आकस्मिक चरण घटत के लिए अनुकारित तापमान संकेतों का विश्लेषण निर्धारित वायु तापमान के प्रति सतह तापमान में धीमी बढ़ोतरी को दर्शाता है। इस सांचे को गहराई के साथ तापमान असंगतियों के वितरण में देखा गया है। उच्चतर पुनर्भरण के एक दत्त मूल्य के लिए सतही तापमान एक समय अवधि के बाद घट जाते हैं और पुनर्भरण के अल्प मूल्य के लिए सतही तापमान असंगति वक्र से मिल जाते हैं। सतही जलवायु परिवर्तन के लिए अधस्तल तापीय पर्यावरण को जानने के लिए रॉबिन प्रकार परिसीमा प्रतिबंध में समय के साथ वायु तापमान की चरघातांकी वृद्धि से युक्त एक विमीय अभिवहन विसरण समीकरण का संख्यात्मक समाधान प्राप्त किया गया है और विभिन्न परिदृश्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले पैरामीटरों के विभिन्न मूल्यों के लिए परिणामों का अध्ययन किया गया है। अधस्तल तापमानों पर द्रव्यमान संचलन (तरल प्रवाह) के साथ युग्मित वायु एवं थल सतह तापमानों के प्रभाव को समझने के लिए ये परिणाम महत्वपूर्ण हैं।

पश्चिमी भारत के कोयना एवं वार्ना जलाशयों के नीचे छिद्र दाबीय विसरण का 3-विमीय प्रतिरूपण

जलाशय-प्रेरित भूकंपनीयता की क्रियाविधि भलीभाँति समझी गई है और विभिन्न जलाशय स्थलों पर भूकंप आने के संबंध में बतलाती है। इसे जल भारण के कारण उत्पन्न प्रतिबल और शैल मैट्रिक्स के भीतर छिद्रों में तरल दाब में परिवर्तनों के प्रति आरोपित किया जा सकता है। पश्चिमी भारत में कोयना-वार्ना क्षेत्र में अनवरत भूकंपनीयता के लिए एक कारण के रूप में छिद्र दाबीय विसरण की जाँच करने के लिए एक 3-विमीय तरल प्रवाह संख्यात्मक प्रतिरूप का उपयोग किया गया है। यह दिखाया गया है कि इस क्षेत्र में भूकंपजनित गहराइयों पर भूकंपों को उत्पन्न करने के लिए जलाशय जल स्तर उच्चावचन पर्याप्त हैं। हमारा संख्यात्मक प्रतिरूप इंगित करता है कि कोयना–वार्ना क्षेत्र में भूकंपों की नाभीय गहराइयों पर दाब के विसरण को 2 से 6 मीटर / दिन तक की द्रवीय चालकता से युक्त एक लम्बवत भ्रंश सुकर बनाता है। साथ ही, भूकंप को उत्पन्न करने के लिए कोयना क्षेत्र की तुलना में वार्ना क्षेत्र के लिए एक उच्चतर लम्बवत चालकता की आवश्यकता होती है। दोनों जलाशयों के लिए उपयुक्त द्रवीय चालकता का उपयोग करते हुए अधिकतम जल स्तर और नाभीय गहराई पर भूकंप को उत्पन्न करने हेतु आवश्यक भारी द्रवीय दाबोच्चता के बीच दो महीनों की अवधि के अंतराल का पता लगाया गया।

नाम पदनाम
डॉ. कीर्ति श्रीवास्तव मुख्य वैज्ञानिक
डॉ. वेंकटरमणा डी. मुख्य वैज्ञानिक
डॉ. कल्पना गह्लौत                 प्रधान वैज्ञानिक
डॉ. नेपाल चन्द्र मंडल वैज्ञानिक
श्री सूरिनायुडु लगुडु वरि. तकनीकी अधिकारी (1)
सुश्री फरवीन बेगम तकनीकी सहायक
श्री साइलु ए प्रयोगशाला सहायक

 

पृष्ठ अंतिम अपडेट : 13-04-2018