एनजीआरआई के सूत्रपात से लेकर, एक विख्यात सुदृढ़ पृथ्वी विज्ञान संस्थान के रूप में इसके क्रमिक विकास तक, भूरसायन विज्ञान एवं भूकालानुक्रम विज्ञान हमेशा प्रमुख अनुसंधान कार्यकलापों के रूप में माने गए हैं। एनजीआरआई के भूरसायन विज्ञान एवं भूकालानुक्रम विज्ञान प्रभागों ने समय के साथ-साथ मामूली आरंभ से संस्थान के अनुसंधान वर्णक्रम के मुख्य आधारों में से एक के रूप में अपना स्थान ग्रहण कर लिया है। समय पर नवीनतम यन्त्र विन्यास का संकलन, के-आर प्रयोगशाला, एएएस प्रयोगशाला, एमसी-आईसीपी-एमएस, एलए-आईसीपी-एमएस, एमसी-टीआईएमएस, एचआर-आईसीपी-एमएस, एक्सआरएफ, एक्सआरडी आदि प्रयोगशालाओं की स्थापना करने से यह संभव हो पाया। चट्टानों का, उनके लेश एवं दुर्लभ मृदा तत्व लक्षणों के बारे में जानने के लिए अभिलक्षणित करना और ठीक आयु निर्धारण के संदर्भ में भूपर्पटीय क्रमिक विकास को समझना भी मुख्य उद्देश्य था। रॉक इवाल, जीसी, जीसी-एमएस आदि पेट्रोलियम भूरसायन विज्ञान प्रयोगशालाएँ हाइड्रोकार्बन संबंधी अनुसंधान कार्यक्रमों को संभालने में सक्षम हैं। भूरसायनिक एवं भूकालानुक्रम विज्ञान प्रयोगशालाओं ने भारतीय उपमहाद्वीप में कई कैम्ब्रियनपूर्व शैल अनुक्रमों के बारे में सबसे पहला महत्वपूर्ण डाटा उपलब्ध कराया है, उपलब्ध इस मूलभूत डाटा का उपयोग करके खनिज निक्षेपों का पता लगाया जा रहा है। जल भूरसायन विज्ञान एक महत्वपूर्ण सामाजिक अंश है क्योंकि इसमें कृत्रिम पुनर्भरण तकनीकों के माध्यम से भूजल में फ्लोराइड का शमन करना शामिल है। जलीय अनुवीक्षण जल संरक्षण, पुनर्भरण और भूजल क्षमता के संबंध में रणनीतियों को बनाने पर जोर देता है। भूविज्ञान और जीआईएस के दायरे में, हिमालय पर्वताग्र में सक्रिय भ्रंशों और विवर्तनिक स्थल रूपों के मानचित्र तैयार किए जा रहे हैं और साथ ही साथ ऊपरी गंगा जलग्रहण क्षेत्र में अपरदनों के स्थानीय मंडलों का भूभाग अभिलक्षणन किया जा रहा है। चंद्रमा, मंगल एवं शुक्र पर चयनित क्षेत्रों के भूवैज्ञानिक मानचित्रों को बनाने के अलावा, चंद्रमा और मंगल के चयनित क्षेत्रों के कालानुक्रम पर नया डाटाबेस भी तैयार किया जा रहा है। 

पृष्ठ अंतिम अपडेट : 02-05-2018