भूगणित, गुरुत्व, चुंबक-विज्ञान, ऊष्मीय भूभौतिकी, पुराचुम्बकत्व तथा शैल यांत्रिकी

सीएसआईआर-एनजीआरआई का सबसे बहुमुखी समूह मूल रूप से विभिन्न भूभौतिकीय परोक्षियों का उपयोग करके भारतीय उपमहाद्वीप की संरचना और क्रमिक विकास को समझने के लिए समर्पित है। सीएसआईआर-एनजीआरआई की स्थापना से ही गुरुत्व और चुंबकीय अध्ययन समूह भूपर्पटीय संरचना एवं क्रमिक विकास तथा प्राकृतिक संसाधन अन्वेषण से संबंधित सैद्धांतिक एवं अनुप्रयुक्त अनुसंधान में शामिल रहा है। समूह ने 1978 में भारत की पहली गुरुत्व मानचित्र श्रृंखला और बाद में 2006 में भारत की संशोधित गुरुत्व मानचित्र श्रृंखला को प्रकाशित किया। समूह ने पहली परम गुरुत्व वेधशाला की स्थापना हैदराबाद में और परम गुरुत्व केंद्रों की अंडमान में पोर्ट ब्लेयर तथा अंटार्कटिका में मैत्री स्टेशन सहित कई स्थानों पर की।

सीएसआईआर-एनजीआरआई में 1962 में ऊष्मा प्रवाह अध्ययन शुरू किए गए थे और 1963 में पहला क्रमबद्ध तापमान मापन दक्षिण भारत के कोलार स्वर्ण क्षेत्र की नंदिदुर्ग खान के अंदर 2150 मीटर की गहराई तक किया गया था। पिछले पांच दशकों में कई भूवैज्ञानिक प्रांतों में बहुत सारे गभीर वेधछिद्रों (200 से 1000 मीटर तक) में तापमान मापन किए गए थे। ऊष्मा प्रवाह को निर्धारित करने और भूपर्पटीय तापीय संरचना को तैयार करने के लिए प्रयोगशाला में हज़ारों शैल नमूनों पर तापीय चालकता मापन किए गए थे।

जीपीएस मापनों का प्रयोग करने वाली विवर्तनिक भूगणित शाखा 90 के दशक के मध्य में अंकुरित हुई। सक्रिय विवर्तनिकी से संबंधित भूपर्पटीय विरूपण प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए करीब 100 जीपीएस वेधशालाएँ इस समूह का एक अभिन्न अंग है। सीएसआईआर-एनजीआरआई का यह समूह अंटार्कटिका के लिए भारतीय अभियान का एक सक्रिय भागीदार है और मैत्री स्टेशन पर  भूकंपीय और जीपीएस वेधशालाओं का रखरखाव करता है।

पुराचुंबकत्व प्रभाग भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न भूवैज्ञानिक प्रांतों में ध्रुव स्थितियाँ, महाद्वीपीय एवं पुराभूगोल पुनर्निर्माण, चुंबकीयस्तरिकी, शैल चुंबकत्व तथा चुंबकीय सुग्राहिता की विषमदैशिकता स्पष्ट करने के लिए काम करता आ रहा है।  

शैल यांत्रिकी प्रयोगशाला भारतीय शील्ड और हिमालय की भूपर्पटीय चट्टानों को शामिल करते हुए चट्टानों का अभिलक्षणन उनके शैलभौतिकीय और यांत्रिक गुणधर्मों के शब्दों में करने वाला भूभौतिकीय अनुसंधान करती है। प्रयोगशाला आंकड़े भूकंप-विवर्तनिकी अध्ययन, खनन एवं इंजीनियरी अनुसंधान, खनिज एवं हाइड्रोकार्बन अन्वेषण, और भूपर्पटी तथा स्थलमंडल के भूभौतिकीय प्रतिरूपण के लिए उपयोगी हैं।

पृष्ठ अंतिम अपडेट : 13-04-2018