सीएसआईआर-एनजीआरआई, 1972 में इंडो-सोवियत सहयोगात्मक कार्यक्रम के ढांचे के अंदर गभीर भूकंपी गभीरतामापन (डी एस एस) अध्ययन शुरू करने वाला देश का पहला संगठन था। पहली डी एस एस प्रोफाइल में पश्चिम में धारवाड़ शिस्ट पट्टी क्षेत्र और पूर्व में कडपा द्रोणी के 600 किमी से अधिक क्षेत्र शामिल था। इस महत्वपूर्ण प्रोफाइल ने भूपर्पटी की मोटाई, गभीर प्रवेशी भ्रंश / विभंग मंडलों की ज्यामिति और मोहो विन्यास तथा धारवाड़ हरिताश्म पट्टी क्षेत्र की अधो-भूपर्पटीय बनावट के बारे में जानकारी प्रदान की। मोहो सीमा के अवभ्रंशन के कारण कडपा द्रोणी बनने जैसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों ने दक्षिण भारत के भूपर्पटीय क्रमिक विकास की हमारी समझ को समृद्ध कर दिया है। 1980 के अंत तक, कई सैकड़ों किलोमीटर की डी एस एस प्रोफाइल तय की गई हैं जिससे भारतीय महाद्वीपीय भूपर्पटी के कई महत्वपूर्ण विवरण सामने आए, जैसे: (i) कैम्बे द्रोणी में अवसादी आच्छादन के नीचे मोटे दक्कन ट्रैप्स का निरूपण, (ii) अंकलेश्वर क्षेत्र में दक्कन ट्रैप्स के नीचे बड़े मोटे मध्यजीवी अवसादों, संभवतः पेट्रोलियमधारी, का निरूपण (iii) खंडवा क्षेत्र में दक्कन ट्रैप्स के नीचे गोंडवाना अवसादों की मोटी परत, संभवतः कोयले युक्त, की पहचान।

संस्थान में तब से नियंत्रित स्रोत भूकंपी अनुसंधान में विशेषज्ञता कई मायनों में बढ़ी है, जैसे कि समुद्री परिवेश में डेटा प्राप्त करना और विश्लेषण करना, खनिज अन्वेषण और भूतकनीकी अनुप्रयोगों के लिए जटिल भूपर्पटीय विन्यास और उथली भूपर्पटी से संबंधित अनुसंधान। भूकंपकी में अनुसंधान एवं विकास दोनों मूलभूत और अनुप्रयुक्त विज्ञानों के सीमांत अनुसंधान का मुख्य आधार बना रहता है।

पृष्ठ अंतिम अपडेट : 22-05-2018